दिन है कभी तो रात है दोनों के दरमियाँ।
बदले हुए ज़ज्बात हैं दोनों के दरमियाँ।
ना जाने कैसी बात है दोनों के दरमियाँ,
ना कोई मुलाक़ात है दोनों के दरमियाँ।
मिलना लिखा नहीं था मुक़द्दर की रेत पर,
बे-नाम सी जो बात है दोनों के दरमियाँ।
नज़दीकियाँ थीं जैसे कोई साया साथ हो,
अब फ़ासलों की रात है दोनों के दरमियाँ।
- अज़हर साबरी
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