तन्हाई की उस झील में,
एक कश्ती हमने बनाई थी,
उसके बीच में हम और तुम थे,
चारों ओर तन्हाई थी।
तुम मुस्कुराई थी,
मेरी बाँहों में समाई थी,
तुम्हारे इंतज़ार में,
एक कश्ती और भी आई थी।
ये मुझे ही पता था,
वो तुम्हें बहुत लुभाई थी,
पर वो कश्ती अपने साथ,
एक आँधी भी लाई थी।
शायद उसके प्यार की आँधी ही,
इतनी तेज़ थी,
डूब गई हमारी कश्ती,
जो कभी न डगमगाई थी।
तन्हाई की उस झील में,
मैं गिर गया था कुछ इस तरह,
शायद तुम इनकार करो,
छींटें तुम पर भी आई थीं।
तन्हाई की उस झील को,
आँसुओं से दरिया कर दिया,
तेरे इंतज़ार को,
जीने का ज़रिया कर दिया।
तुम चली गई हमसे दूर,
यादें हमें सताएँगी,
कहते हैं डूबी कश्तियाँ,
न वापस आई हैं, न आएँगी।
तुम्हें भुलाने की कोशिश में,
दोस्तों को अक्सर पिलाकर रो जाएँगे,
याद फिर भी आएगी तुम्हारी,
तो चाँद को देखकर रात गुज़ार जाएँगे।
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