इश्क़-ए-कलम का कैसा है खुमार सोचिए,
घर-बार जल रहा है, मै नज़्म लिख रहा हूं !
कुछ बीते हुए किस्से, कुछ चुप्पियां चुभन सी,
कुछ बेवजह के आंसू, वो याद कुछ घुटन सी,
गहरा था कितना, था जो ऐतबार सोचिए,
संसार चल रहा है, मै नज़्म लिख रहा हूं !
रफ़्तार तो है कम पर, किरदार ठोस अपना,
खुशियां सभी में बांटू, इतना सा ख़्वाब अपना,
ये शब्द भी भला क्या चुभते हैं, सोचिए तो?
कितनों को खल रहा है, मै नज़्म लिख रहा हूं!
कोई हारने का सोचे,संबल मैं बन सकूं गर,
बैरागियों को अपना, सहचर जो कह सकूं गर,
'आयुष' तभी है शीर्षक, पहचान देखिए,
सब काम चल रहा है, मै नज़्म लिख रहा हूं !
~आयुष कुमार
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