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घर-संसार

                
                                                         
                            फेसबुक पर तुमको देखा,जब मैंने पहली बार।
                                                                 
                            
सोच लिया फिर संग तुम्हारे,ही बसाऊंगा अपना घर-संसार।।

मृदुभाषी थी तुम,कूट-कूट के भरा था तुममें संस्कार।
मंमी को मांजी कहती,डैडी से करती थी प्यार।।

बहिना मेरी, सखी-सहेली तुम्हारी।
छोटे भाईयों को करती थी दुलार।।

"मैं" फौजी था,मनमौजी था,अपनी धुन में रहता था।
करता था फौज की बातें,क्योंकि तुमपे मरता था।।

पूछती थी तुम जो कुछ भी,सब-कुछ शेयर मैं करता था।।
तुमसे प्रेम था मुझको,अपनी हर पिक भी भेजा करता था।।

पर तुम निकली एजेंट पाकिस्तान की,कहां इल्म इसका मुझको था।
मैं था पागल प्यार में तेरे,तेरी तरफ से तो सिर्फ इक धोखा था।।

हनीट्रेप में फंसा हुआ,अब मैं एक देशद्रोही था।
जवान हूं सेना का,अब कोर्टमार्शल होना तो पक्का था।।

ले ली जान खुद की ही,परिवार भी बर्बाद कर डाला।
लाडला था घर का मैं,अब घर में ही मातम कर डाला।।

सुनो दुनिया वालों,फेसबुक-ट्वीटर के चक्कर में मत पड़ना।
शूरत,एश्वर्या जैसे क्यूं न हो,किसी हनीप्रीत के चक्कर में मत पड़ना।।

- अविनाश डबराल

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5 वर्ष पहले

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