पावस की ऋतु ने किया, ऐसा गजब कमाल।
नदिया तो इतरा रही, मुंँह बिचकाते ताल।।
मुंँह बिचकाते ताल, पेड़ की फुनगी बोली।
जैसे बरगद आज, भांग की खाते गोली।।
पूनम के है बाद, हमेशा आती मावस।
ऋतुओं में सिरमौर, लगी मुझको है पावस।।
-अविनाश ब्यौहार
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