छल फरेब बो गई अदालत।
इक धोखा हो गई अदालत।।
जब-जब खतरा मंडराया है,
कुर्सी पर सो गई अदालत।
फटे चीथड़े पहने घूमे,
बच्ची सा रो गई अदालत।
पैसों की माया देखी तो,
सपनों में खो गई अदालत।
सच्चाई को परख लिया जब,
पल भर में लो गई अदालत।
-अविनाश ब्यौहार
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