खुदखुशी को मैं कहाँ मौत कहता हूँ,
ज़िंदगी के पड़ाव को एक ठहराव कहता हूँ।
जो बिछड़ गया, वो मिटा नहीं करता,
मैं हर अंत को एक नई शुरुआत कहता हूँ।
साँसों का सिलसिला ज़मीं पर थम जाता है,
पर रूह का सफ़र अर्श पर कहाँ रुकता है।
मौत तो सिर्फ़ जिस्म की जुदाई है,
इसे मैं रब से मुलाक़ात कहता हूँ।
'बेसुध' ये फ़क़त नज़र का फ़रेब है,
जिसे दुनिया मौत कहती है,
मैं उसे विसाल-ए-हक़ कहता हूँ।
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