आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

साँसों का सिलसिला ज़मीं पर थम जाता है

                
                                                         
                            खुदखुशी को मैं कहाँ मौत कहता हूँ,
                                                                 
                            
ज़िंदगी के पड़ाव को एक ठहराव कहता हूँ।
जो बिछड़ गया, वो मिटा नहीं करता,
मैं हर अंत को एक नई शुरुआत कहता हूँ।

साँसों का सिलसिला ज़मीं पर थम जाता है,
पर रूह का सफ़र अर्श पर कहाँ रुकता है।
मौत तो सिर्फ़ जिस्म की जुदाई है,
इसे मैं रब से मुलाक़ात कहता हूँ।

'बेसुध' ये फ़क़त नज़र का फ़रेब है,
जिसे दुनिया मौत कहती है,
मैं उसे विसाल-ए-हक़ कहता हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर