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क्रोध, लोभ और मोह जैसी व्याधि

                
                                                         
                            स्वम् की विजय के मध्य खड़ा मैं,
                                                                 
                            
क्या जीवन का सम्मान कहूँ,
या अपने मन के चंचल भावों पर,
किया गया संयम का वरदान कहूँ।

रणभूमि में जीत मिल जाये तो,
यश के दीपक चहूँ दिश जलते हैं,
पर जो अपने भीतर जी लेते,
वो ही तो इतिहास बदलते हैं।

क्रोध, लोभ और मोह जैसी व्याधि,
हर मन को बार-बार भरमाते हैं,
इनके आगे जो झुक न पाएँ,
वही संसार में सच्चे वीर कहलाते हैं।

दुनिया को जीतना सरल है कितना,
मगर अपने मन की जीत कठिन,
स्वयं पर जिसने विजय पाई,
उसका जीवन हुआ सफल ।
— बेसुध
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20 घंटे पहले

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