चंद लफ़्ज़ों में कहाँ बयाँ होंगे राज़ हमारे,
ज़रा पास तो बैठो, गुफ़्तगू कर जाएँगे।
खुलेंगे राज़ ज़माने के हमसे,
तुम कहोगे—बहुत कुछ दबाए बैठे हो।
तेरी आँखों में जो सवाल ठहरे हैं,
हमने उनमें कई जवाब रखे हैं,
तुम पढ़ोगे अगर ख़ामोशी हमारी,
कहोगे—दिल में किसको बसाए बैठे हो।
कुछ ज़ख़्म ऐसे भी हैं रूह के अंदर,
जिन्हें मरहम की ज़रूरत नहीं होती,
बस कोई अपना पूछ ले हाल-ए-दिल,
कहोगे—इतना दर्द कहाँ से लाए बैठे हो।
हमने दुनिया से हँसकर बात की मगर,
अपने हिस्से की रात रोकर काटी,
तुम जो पूछोगे वजह उदासी की,
कहोगे—किसका ग़म दिल से लगाए बैठे हो।
तुम्हें चाहना कोई गुनाह तो नहीं,
फिर ये दिल इतना बेकरार क्यों है,
मेरी आँखों में देखना एक दफ़ा,
कहोगे—इश्क़ हमसे छुपाए बैठे हो।
‘बेसुध’ अब राज़-ए-दिल क्या छुपाएँ तुमसे,
तुम तो हर ख़ामोशी पढ़ लेते हो,
हमने माना नहीं इश्क़ का नाम कभी,
तुम कहोगे—मगर दिल में बसाए बैठे हो।
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