बेवफ़ा है तो रह,
वफ़ा का ढोंग तो मत कर,
जब छोड़ दिया बीच सफ़र में,
फिर मंज़िलों की बात मत कर।
रहगुज़र और भी मिल जाएँगी,
राह चाहे तन्हा हो बेशक,
कीमत गिरा ली नज़रों में अपनी,
खुद को बेशकीमती कहकर।
हुनर मिला तो सिला देंगे,
तेरी बेवफ़ाई का हम भी,
बस महफ़ूज़ रख ख़ुद को,
महफ़िलों की शम्मा बनकर।
भरी महफ़िल में जब वो सामने आई,
हमने भी अपने दर्द को लहजे में ढाल दिया।
जो छोड़ गई थी बीच सफ़र में कभी,
उसी के सामने ग़ज़ल कह उसे बेचैन किया।
न शिकवा किया, न कोई सवाल किया,
बस अल्फ़ाज़ से अपना मलाल बयां किया।
वो सुनती रही ख़ामोश होकर,
और हमने "बेसुध" उसे आइने के हवाले किया।
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