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वे अपने घर लौट आते हैं

                
                                                         
                            वे अपने घर लौट आते हैं
                                                                 
                            
दिन उगता है रात उगती है
दिन ढ़लता है रात ढ़लती है
रात के हिस्से में अंधकार है
दिन के हिस्से में प्रकाश है
दिन और रात तय समय पर
रोज अपने घर लौट आते हैं।
सूरज उगता है सूरज ढलता है
पर चान्द न उगता है न ढ़लता है
चान्द घटता है और बढ़ता है
धरती प्रदक्षिणा करती है सूर्य की
चान्द प्रदक्षिणा करता है धरती की
धरती,सूर्य और चन्द्रमा तय समय पर
अपने परिवार से मिलने के लिये
वे अपने घर लौट आते हैं।
चान्द,सूर्य और धरती के कर्तव्यमार्ग पर
नियत समय पर अपने रिश्ते निभाना
पीव प्रकृति का एक पर्वोत्सव हो गया।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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