भोलीभाली जनता, यह शहर बडा निराला है
नेता रंग बदलता, प्रकृति ने बदला पाला है।
बदनाम हुआ गिरगिट,बात ये सुहाती है
सुलग रहा यह झूठ,तपिस इसकी जलाती है।
मैं खामोश नही हूं ,मेरी माटी अपना दर्द छिपाती है।
नदिया जंगल और पहाड भले बेजुंबा है
शान से जी रहे इनके कातिल, शर्म आती है।
तुम यह सब सह लेते हो, दिलदार हो बडे
मैं सह न पाता, करता हूं कई प्रश्न खडे।
अकेले भभकता दिया, बनकर कब तक जिऊंगा
चोट करते है वे मातृभूमि पर, कब तक सहूंगा ।
पीव जननी ये जन्मभूमि है, खामोश दर्द सब सहती है
सरकार हुई सौदाई, जनता तिल तिल मरती है।
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