मुझे याद आता है बचपन सुहाना
नानी की कथडी वो बिस्तर पुराना।
नांद में नहाना, कुए से पानी लाना
दूद छिरिया का पीना मस्ती में जीना
वो लालटेन,चिमनी, वो चूल्हे का जमाना
मुझे याद आता है अपना बचपन सुहाना
ननिहाल जाना, आम-महुआ को बीन लाना उफनती नर्मदा का सफर, लगता था सुहाना मल्लाह का नाव में बाधवान लगाना वो बारिस की झडी वो बाढ़ का जमाना
खेत जंगलों की गलिया सब जाना पहचाना।।2।। मुझे याद आता है अपना बचपन सुहाना
घर-घर दूद के तसले दही घी का खजाना नानी मामाओं का शहर बेचने जाना नर्मदा की मंझधार में दूद चढ़ाना
बच्चों की बत्तू लाना,बर्तन मॉज लाना।। मुझे याद आता हैअपना बचपन सुहाना
गईया की सार में किंची अंटी खेलना,
अंटे को कुहनी से गुच्चू में ढकेलना
संगी साथी बन मामाओं का मुझे झेलना,
मुझे जिताने आखिरी तक खेलना
गल्तियो को मेरी वो अपने सर लेना।
मुझे याद आता है अपना बचपन सुहाना।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X