मोहल्ले की रौनक आवारा कुत्ते
जैसे शहर के हर मोहल्ले में
मोहल्ले की हर गली में
और हर गली के
किसी सुनसान घर में
रहते हुये मिल जाता है
बीमार मरियल से कुत्ता
कुतिया और उसकी पलटन।
दिनभर गली के एक कौने से
दूसरे कौने में भागता रहता है
भूखा-प्यासा वह कुत्ता।
रोज रात गहराते ही
सबके सोने के बाद
वे न जाने क्या सुन लेते है
उन्हें क्या दिख जाता है
वे क्या सूघ लेते है
भौंकते रहते है
किसी को सोने नही देते है।
मन करता है
इन कुत्ते का काम तमाम कर दू
और इत्मीनान से गहरी नींद सोऊ।
कभी कभी एक साथ
कई कुत्तों के भोंकने
और झगड़ने की आवाजें
बैचेन कर देती है
सभी को
फिर ख्याल आता है
छोड़ो उसे
जिसे एक रोटी भी नही खिलाई
फिर भी मोहल्ले में
रहने का फर्ज निभा रहे है
किसी अंजान कुत्ते ही नहीं
व्यक्ति के आने की सूचना
भौककर सतर्क करते है
और कभी कभार
मोहल्लेवालों के लिये
लड़ पड़ते है अपने से बड़े कुत्ते से
और घायल होकर
काऊ-काऊ कर जख्मी हो जाते है
कोई भी उन बीमार कुत्ते का
इलाज नहीं कराता है
नींद में दखल देने के लिये
कुत्ते को मारना तो
सभी चाहते है पीव।
फिर छोड़ देते है यह कहकर
बिचारे मर जायेगे
तो इस मॅहगाई में
मुफ्त के चैाकीदार कहां मिलेंगे
अपने ही स्वार्थ के रहते
हम सह जाते है इन कुत्तों का जुर्म
यह इत्मीनान करके
चलों इन कुत्तों को जिंदा रखें
ताकि पीव मोहल्ले की रौनक बनी रहे।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X