माॅ नर्मदा की शरण
माॅ नर्मदा को दीप लगाऊं
तब पवन बेग से चलती है
मैं पूजा का दीप छिपाता हॅूं ।
मन की व्यथा सुना न पाऊं
भाव मेरे मन में ही थम जाते हैं
तब आंखों से सब कह देता हॅू।
सीढ़ी की ओट में दीपक जलाकर
गुपचुप दीपक घुमाता हॅू
पीव प्राणों का नेह जगाता हॅूं।
युगो-युगों से नर्मदा से नाता
ऐसे ही सब निभाते आये हैं
माॅ रेवा की शरण मैं नादान आया हॅूं।
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