जब जब दिल का दर्द, असीम हो जाता है
तब-तब मुर्दा शांति सा, यह शरीर भर जाता है।
गायब हो जाती है तडफ, ठहर जाते है मनोभाव
मर जाते है सपने, हो जाता है शमशान सा ठहराव।।
रोज रोज घर से काम पर निकलना, और लौट कर आना
कितना कष्टप्रद होता है, दुनिया में सब कुछ सह जाना।
द्वेष हिंसा और वासना,है आदमी के स्वार्थ की कहानी
छल,कपट और बेईमानी, है धर्म के विनाश की वाणी।
नींद के नहीं, मैं जागते सपनों को देखता रहा हूं
समय की हर करवटों में, सौ-सौ बार मरा और जिया हूं।।
खामोशी से शांत है शरीर, जीवन का हर पल थम सा गया है
डूब रहा आत्मा का सूरज, चेतनमन मौत में रम सा गया है।।
‘’पीव’’ कितना खतरनाक होता है,जीवन में सपनों का मर जाना
अपने जिस्म को मुर्दा बनाकर,उस मुर्दाशांति से खुद भर जाना।।
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