उन्हें खोने का डर हम अपने सीने में पालते रहें,
ना जाने कैसा शहद था उनकी 'ना' में, कि हम हर बार सुनते रहें।
वो करते थे तारीफ़ हमारे अल्फ़ाज़ों की, शायद इसीलिए,
हम उनकी हर 'ना' के पीछे, एक 'हाँ' ढूँढ़ते रहें।
हरी शाख़ों पर खिले सफ़ेद फूल देखकर सोचा, कुछ उन्हें भी दे आएँ,
पर उनकी एक 'ना' से, ये फूल हाथों में ही सूखते रहें।
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