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हिज्र का खौफ़

                
                                                         
                            तेरी हर एक बात, हर शर्त मुझे मंज़ूर है,
                                                                 
                            
हयात के सारे सितम हँस कर सह लूँगा।
मगर तेरा वो बिछड़ जाना...
तेरे हिज्र के खौफ़ से ये दिल आज भी रंजूर है।

तेरे जाने का सदमा ज़हन में अज़ाब सा रहता है,
एक खामोश सा दरिया मेरे सीने में बहता है।
ज़रा ठहर जा, दो पल और मेरे पास रुक जा,
वो कौन सी बंदिशें हैं, जिन्होंने तुझे जकड़ रखा है?

तुझसे अक़ीदत ऐसी है कि हम मुक़द्दर बदल देंगे,
खुदा से बग़ावत कर के नसीब के हर्फ़ बदल देंगे।
तू बस एक दफ़ा ऐतबार कर के इक़रार तो कर,
तेरी हर रंजिश को हम तबस्सुम में बदल देंगे।

तेरी ख़ामोशी का ये अज़ाब अब सहा नहीं जाता,
इस कश्मकश के भँवर में अब जिया नहीं जाता।
मेरी हयात और मौत अब बस तेरे लबों पर ठहरी है,
तेरे एक इक़रार या इंकार पर मेरी आखिरी साँस अटकी है।
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एक घंटा पहले

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