आज रजनी नव कर्पट ओढ़े, अंबर पर आई सजके।
आज गगन से चटक चंद्रिका, बरसाए अमृत रजके।।
नभ की मृदुल-मृदुल बदलियाँ, अलकें हों निशि की जैसे।
तारागण क्रम में रच चमके, भूषण पर मुक्तिज जैसे।।
भोर भोर ही नीर बिंदुका हरित तृणों पर बिछ जाएँगी।
धरणी की धानी साड़ी पर स्वातीसुत सम सज जाएँगी।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X