मेरी शाख़ों से पत्ते गिरते रहे,
जाते हुए
मेरे तन पर
बस सूखी शाख़ें छोड़ गए।
तो पहली बार
अपने वजूद से
रूबरू हुआ था मैं।
मैंने उन पत्तों को छोड़ा नहीं,
बस उन्हें जाने दिया।
उनके जाने के बाद
कुछ देर ख़ामोश रहा मैं।
इस पतझड़ में
मेरे रंग उतर गए,
मगर वजूद क़ायम रहा।
शाख़ें भले अब भी ख़ाली थीं,
इस पेड़ को यक़ीन था—
मौसम बदलने वाला है।
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