मेहनत, किस्मत, तन्हाई फिर आंशु
हे प्रभु, जिसमें भी तू राजी था।
बेज्जती, दुख, दर्द फिर घुटन
क्या कुछ और अभी भी बाकी था?
जीने को पी गया ये सारे ज़हर,
मरने को बस एक जहर ही काफी था।
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