मीलों तक सन्नाटा है,
सपनों की सूनी डगर, रास्ते हैं सूने।
ऐसे में अब किसको खबर?
मोर, पपीहा, चातक गाये,
मधुमास अब बीता जाये,
यौवन मेरा रीता जाये।
ताकें अखियाँ पथराई सी,
डसती नागिन पुरवाई भी,
आज न आये बालम मेरे।
झरी बदरिया झर-झर बरसे,
तुम बिन ये दृग कब से तरसे।
चाह मिलन की, दूर हैं प्रीतम,
कितना कोई खुद को समझाये!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X