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दरिया सागर से मिलता हो जैसे।

                
                                                         
                            हम उनसे मिले इस तरह
                                                                 
                            
दरिया सागर से मिलता हो जैसे।
उनका हँसना, फूल खिलते हैं जैसे
उनका चलना, नागिन की तरह।
हमसे लिपटे हुए हो ऐसे
बेल कोई तरुवर पर जैसे।
फैली हुई जुल्फे ऐसे
चाँद छुपता हो बादलों की तरह।
हम उनसे मिले—
सावन की बरसातों में ऐसे
बिजलियाँ बादल में जैसे।
वो हम में, हम उनमें समाने लगे
धड़कने धड़कती रहीं
सरपट दौड़ती रेलगाड़ियों की तरह।
हम उनसे मिले इस तरह—
उनके नाजुक लबों पर जैसे
शबनम सी मधु फैली है ऐसे।
उनके रुखसारों की कसम
चाँद झिलमिल झीलों में।
कसमसाये हुए हमसे लिपटे वो ऐसे
कर-करा उठे हड्डियों की तरह।
आड़-चलता नहीं दिल पे अपने
उनकी मादक अदाओं के सामने।
याद आती है ख्वाबों में ऐसे
फूल पर तितलियों की तरह।
हम उनसे —
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35 मिनट पहले

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