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दरिया सागर से मिलता हो जैसे।

                
                                                         
                            एक नदी
                                                                 
                            
पहाड़ से उतरती,
घाटी में गिरती,
झरना से झरती।
अजस्र शाखाओं से फूटती,
उछलती, कूदती, सरकती,
हहराती, लहराती, चट्टानों से टकराती,
आगे बढ़ती।
लिये रस कितने तरु-ललना-लताओं का,
पालती कोख में कितने ही जीव।
नाचती, कूदती, गाती चलती जाती,
जीवन का उत्सव बनाती।
कितने मिट्टी के कण, बालू, पत्थर
साथ लाती, मैदानों में फैलाती,
उर्वर बनाती।
मैदानों को सींचती,
हरियाली फैलाती।
सबों को अपना मीठा जल पिलाती,
हरती प्यास कितनों का, रोग, शोक।
कहीं चौर कहीं नदिया, कहीं गोखुर
झील बनाती, आगे बढ़ती जाती।
जीवन का गीत गाती,
सागर से मिलने जाती।
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35 मिनट पहले

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