आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मानवता का धर्म नया है

manawata ka dharm naya hai
                
                                                         
                            मानवता का धर्म नया है
                                                                 
                            

धूप वही है, रुप वही है,
सूरज का स्वरूप वही है।
केवल उसका आभाष नया है,
किरणों का एहसास नया है।

रीत वही है, मीत वही है,
जीवन का संगीत वही है।
केवल अपना राग नया है,
मित्रों का अनुराग नया है।

 नाव वही, पतवार वही है,
बहते जल की धार वही है।
केवल नदी का किनारा नया है,
इस जीवन का सहारा नया है।

खेत वही है, खलिहान वही है,
मेहनतकश किसान वही है।
केवल उपजा धान नया है,
धरती का परिधान नया है।

मन वही है, तन वही है,
मेरा प्यारा वतन वही है।
केवल अपना कर्म नया है,
मानवता का धर्म नया है।
                     
- अशोक बजाज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर