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गर ख़्वाबों में उदासी हो तृष्णा भटकने लगती है

                
                                                         
                            उम्मीद का दीया लिए फिरते हैं
                                                                 
                            
दिल की गलियों में।
जब बढ़ती है ख़्वाहिशो की लौ हर
सांस सुलगने लगती है।।
हर मौसम हो बहारों का ये उम्मीद
दिल को होती नहीं।
ख़िज़ां में भी तरावट हो तो चाह
बहकने लगती है।।
सन्नाटे में है रात ढली हसरतें है
सरगोशी की।
हर शय में बेतरतीबी हो तो आस
चटकने लगती है।।
मोहब्बत के तिज़ारत में बेसुध हो
जाती है सुधियां।
गर ख़्वाबों में उदासी हो तृष्णा
भटकने लगती है।।
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एक घंटा पहले

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