जो कहना था वो कहा नहीं
जो ना कहना था बोल गया,
जीवन भर के रिश्तों को वो
चंद लफ़्ज़ों में हीं तोल गया।
उद्गार थे जो दिल में दबे
उसको सतह पर आना था,
छुपी रिश्ते की सच्चाई को
एक रोज़ तो सामने आना था।
ज़हर बुझे उन शब्दों का
नाज़ुक दिल पर वो असर रहा,
कितनी भी हुई अमृत वर्षा
विष ताप पर वो बेअसर रहा।
भूले बिसरे लम्हें भी अब
स्मृति पटल पर आते हैं,
मन के शांत सरोवर में
हलचल मचा कर जाते हैं।
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