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लोग सम्बन्धों में जीते हैं

                
                                                         
                            लोग सम्बन्धों में जीते हैं।
                                                                 
                            
ये लड़ियाँ हैं सुनहरी रुपहली अथवा स्याह भी
फैली हैं अनन्त से अनन्त तक
सिमटी है उन्हीं में अतीत वर्तमान और भविष्य की कड़ियाँ
खुरदुरे,सुकोमल जीवन के वे चरण
गढे जिन्होंने हँसते रोते मुखड़े
वे सम्बन्ध
खेतों खलिहानों की डगर पर
पशु पक्षियों की पहचान से जुडे,
कुत्तों और बिल्लियों की चमकती आँखों में
दिखते आकर्षण में,
क्या यही प्रेम है?
क्या यही वजह भी ब्रह्माण्ड का ?
क्या यही कृष्ण ने चाहा?
फिर रचा क्यों महाभारत?
क्यों परवा की आचार विचार की।
प्रेम में मर्यादाएँ क्यों?
मर्यादा जुड़ी हो प्रेम से, आसक्ति से
ब्रह्माण्ड का यही रहस्य वह
अपरिहार्य सह अस्तित्व का।
आकाशीय उर्जा पिंड के बंधन
मर्यादाएँ चूकीं तो चूका सब,
नष्ट हो जाए गर मर्यादा सम्बन्धों की
नष्ट हो जाए ये दुनिया
दुनिया प्रेम की , क्षोभ की, विक्षोभ की
सब प्रेम के ही मार्ग ।
दूरगामी।
सरल हों कि वक्र
शुद्धता के परीक्षण हेतु बिखरे हैं सर्वत्र
करते हैं पथ प्रदर्शन
इसलिए है संघर्ष
सतत और सतत्
यही है ईश काम्य।
यह सम्बन्धों का प्रेम
ये तार जीवन के।
लौकिक भी, अलौकिक भी
विवेच्य है आलोच्य नहीं
शुद्ध है अशुद्ध नहीं।
यही है विश्व काम्य।
जीवन आराध्य।
 
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2 घंटे पहले

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