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भ्रष्टाचार पर कविता

                
                                                         
                            कांटों वाला इक वृक्ष उगा
                                                                 
                            
बढता ही गया बढता ही गया
काटा-पीटा, नोचा तोड़ा,
नहीं मरा,नहीं गिरा
भीतर-अंदर जड़ फैल गई
जड़ है तो फिर से पनपेगा,
फूलेगा और फैलेगा
फिर इक दिन ऐसा आयेगा,
हर कोई इसकी जकड़ में हो
गर बढने से है रोकना,
जोर तुम्हारी पकड़ में हो
चंद सिक्कों की खातिर उसने,
अपना ईमान बेच दिया
परोपकार का नाम लिया
अपनी रोटी को सेंक लिया
आज महलों में वो वास करे,
हो सकता है कल सड़क पर हो
आगे बढो ,कुचलो इसको,
शाखाएं इसकी तोड़ दो
यह गलत दिशा में बढ रहा,
तुम इसका बढना रोक दो
नहीं रुकेगा यह बढना
जब तक प्रहार न जड़ पर हो


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6 वर्ष पहले

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