कांटों वाला इक वृक्ष उगा
बढता ही गया बढता ही गया
काटा-पीटा, नोचा तोड़ा,
नहीं मरा,नहीं गिरा
भीतर-अंदर जड़ फैल गई
जड़ है तो फिर से पनपेगा,
फूलेगा और फैलेगा
फिर इक दिन ऐसा आयेगा,
हर कोई इसकी जकड़ में हो
गर बढने से है रोकना,
जोर तुम्हारी पकड़ में हो
चंद सिक्कों की खातिर उसने,
अपना ईमान बेच दिया
परोपकार का नाम लिया
अपनी रोटी को सेंक लिया
आज महलों में वो वास करे,
हो सकता है कल सड़क पर हो
आगे बढो ,कुचलो इसको,
शाखाएं इसकी तोड़ दो
यह गलत दिशा में बढ रहा,
तुम इसका बढना रोक दो
नहीं रुकेगा यह बढना
जब तक प्रहार न जड़ पर हो
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X