राज छिपे कितने
जिसकी गहराई में
कोई नहीं उतरना चाहे
खारे पानी की खाई में
निकले हो तेरह तेरह
नग जिसके मंथन में
राज छुपे होंगे कितने
उस अथाह के मन में
ये परिस्थिकी तंत्र बड़ा
संपति का परकोट खड़ा
इसके सर्प मकर विकराल
किस छन बने काल का काल
इसने नमक चुराकर
दुनिया को मधुर बनाया
चुटकी भर नमक को पाकर
व्यंजन इतना इतराया
सरिताये सारी इसकी
चाहे घातक या अच्छी
चंदा सूरज भी इसके
बिन पंख पालतू पक्षी
महिमा है इसकी भारी
ये श्रीहरि का ससुराल
बड़ी खुशामद डुबो डुबो के
करते लालो के लाल
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