आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रह के खामोश

                
                                                         
                            रह के खामोश, करते हैं बातें,
                                                                 
                            
सुनते बहुत हैं, सुनाते नहीं हैं.

है मुहब्बत बे -इंतहा उनसे,
लेकिन कभी भी जताते नहीं हैं.

हैं ख़्वाहिश मिलने की उनसे,
मगर कभी भी बताते नहीं हैं.

रूठना न हमसे, भूल कर कभी,
हम वो शख्श हैं, जो मनाते नहीं हैं.

कर्ज़ा न देना हमें तुम कभी भी,
लेते हैं हम मगर, चुकाते नहीं हैं.

अकेला न होने देंगे तुम्हें हम,
पकड़ा जो हाथ, छुड़ाते नहीं हैं,

अरविन्द कुमार अग्रवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर