कहते हैं औरत श्मशान नहीं जाती है...!
मगर क्यों?
शायद वे किसी अपने का मरना नहीं देख पाती हैं।
जब जलाया जाता है जीव को,
उसकी खाल मोम-सी पिघलती है,
जब जल-जलकर, तपकर,
उसकी अस्थियाँ राख में बदलती हैं,
तब प्रायः ऐसे दृश्यों को देखकर
नारियों की आत्मा काँप-सी जाती है।
शायद इसीलिए…
शायद इसलिए नारी श्मशान नहीं जाती।
लेकिन मेरा ऐसा मानना नहीं।
क्योंकि जब नकारने को किसी को उतरती नारी,
तब वह हृदय के साथ
आँखों को भी पत्थर कर जाती है।
फिर मैं कैसे मान लूँ?
कैसे मान लूँ कि नारी
इसी वजह से श्मशान नहीं जाती?
लेकिन यह बात तो सदियों से हमारे धर्मग्रंथों में लिखी जाती है
नहीं।
मैंने नहीं पढ़ी ऐसी कोई किताब,
कोई दर्शन पुराण,
जिसमें नारी को कमजोर कहे जाने वाली बातें लिखी जाती हों।
तो शायद...औरतें जन्म-मृत्यु के चक्र को नहीं समझ पातीं,
तभी वे श्मशान नहीं जातीं हैं।
नारी ब्रह्म को जन्म देने वाली जननी भी है,
नारी काल को पदतले दबाने वाली हननी भी है।
नारी मोक्ष भी है,
नारी बंधन भी है।
नारी उमंग भी है,
नारी क्रंदन भी है।
नारी समस्य समान-विलोम का बोध है।
फिर मैं कैसे मान लूँ
कैसे मान लूँ कि नारी जन्म-मृत्यु के चक्र से अबोध है?
मैं बताती हूँ—
जब नारी की किसी से ममता जुड़ जाती है,
जब वह किसी अपने का रोदन नहीं देख पाती है,
तब वह निर्भीकता से
यमराज की बाट रोककर खड़ी हो जाती है।
अपनों के लिए
वह बुझी हुई चिता में भी
साँसों की आहट खोजने लगती है।
कहीं ये निर्भीकता,
कहीं ये निर्भीकता
सकल मानवता को अमर न बना दे...
इसलिए वे श्मशान जाने से रोकी जाती हैं।
इसलिए वे श्मशान जाने से रोकी जाती हैं।
इसलिए नारी श्मशान नहीं जाती है।
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