आने वाले दिनों मेंं एक समय आएगा
जब मौन होगी प्रकृति
व्याकुलता लिए चिल्लायेगा मनुज
अभी पानी बहा रहे
पौधे गिरा रहे जानकार भी
कि इनके बिना नहीं है जीवन
जब बंजर हो जाएगी जमीन
हम तरसेगें अनाज को
जब तपेगी धरा दोष सूरज को देंगे
न सुनने को मिलेगा पक्षियों
का कोलाहल
जब दानों की बजाय चिड़िया
की चोंच मे पत्ता होगा
तब घरो की छतों पर भी छाता होगा
तब हमारी आने वाली पीढ़ी
पियेगी हमारे दुष्कर्मों
का कड़वा हलाहल
तब आस लगाओगे आसमाँ से
फैलायेगें कुदरत के आगे हांथ
न दिखेगी दिन मे चहल- पहल
उल्टे होने लगेंगे सभी काम
तब भविष्य मे लगाओगे
वर्तमान के दाम
आने वाली पीढ़ियां कोसेगीं हमे
जिस रफ्तार से बढ़ रहे है अभी
एक दिन हमारी कामयाबी ही
थाम देगी इन्हे
तब मौन होगी प्रकृति
गुम हो जाएंगे सन्नाटे भी
अजीब चिन्नाहट मे परिवर्तित हो
✍️कुँवर अरुण
जाएंगे मैदान...
भविष्य मे एक समय आएगा!
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