यादों के सफ़र में
आइए, हमराह बन चलते हैं,
पुरानी यादों के सफ़र में,
बचपन भरे छोटे से दिल में
जब पूरा शहर बसता था |
जब जीते थे जीवन बेफिक्री में,
हर एक दिन नया त्यौहार सा लगता था।
जब माँ के आंचल में,
मिलती थी सुकून की छांव,
माँ की मीठी लोरी में,
समा जाता था स्वप्न-संसार
सारे संसार का सुख
सिमट आता था उसी पल में
माँ के आंचल में छुपकर,
हर दिन सुहावना सा लगता था।
प्रेम पिता का भी कम नहीं,
सदा सिरहाने सा सुखद एहसास
मजबूत बदन सधे कंधे सख्त से हाथ,
पकड़कर सदा उंगली बना रहा साथ
कभी हंसाती, कभी पलकों को भिगो जाती,
यादें धुंधली दिल के पास
छोटी सी प्रेम-मयी डांट फटकार,
अनमोल नरम बिछौना सा लगता था
रिमझिम रिमझिम फुहारों में जब,
बनती बिगड़ती थी कागज की कश्तियां,
दोस्तों से मिलता था प्रेम-खुराक,
और मिलता था ढिशुम- ढिशुम वाला प्यार
तसव्वुर में ना पैसों की चाहत थी,
और ना ही मुस्तकबिल की फ़िक्र
हर चोट की दवा दोस्तों का साथ,
हर दिन सबसे बड़ा याराना सा लगता था।
पैर थके ना, अनजाने से रास्ते पर,
चलना था मुझको आगे बढ़कर,
धूप खिले या रैन अंधेरी,
दर्द-ए-दिल समझाया शब्द चुन-चुन कर
मन में आशा, मन की अभिलाषा,
हर लफ्ज़ में अपनी रूह को उतारा
समझ सके ना हाल-ए-दिल इशारों में “अरुण”, सब भूल जाना ही तब गँवारा लगता था |
जब जीते थे जीवन बेफिक्री में,
हर एक दिन नया त्यौहार सा लगता था।
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