समझ से परे
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया,
सुनाई देती हैं जहां,
अरुण करुण रुदन में भी,
हास परिहास की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया
जन्म से मरण तक की यात्रा में,
आते हैं कई पड़ाव जहां,
प्रति-पर्व सह उन्माद मनाते हैं,
बनाते हैं अलिखित इतिहास नया,
कलह कलरव ,वाद-विवाद में भी
सुनाई देती है गीत -गायन आवाज़ की बात,
हास परिहास की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया
समय-प्रवाह के मध्य
माध्यम बने अनेक बंधन,
मद मदमस्त मंद जीवन-धारा के अनुरुप
अलग अंदाज अलग प्रेम संचरण
रुचिकर प्रमेय में भी,
सुनाई देती है जीत हार की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया
अरुण करुण रुदन में भी,
हास परिहास की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया
जब मैं जीवन से जुड़े अधिनियम और
उसमें बने नियमों के तहत
अपने अन्तर्मन का आँकलन करता हूँ,
मूल्यांकन करता हूं
अपने अस्तित्व के लिए
और फिर समीक्षा के बाद
अपील दायर करने का मिलता नहीं है मौका
सुनाई देती है यहाँ भी विकार स्वीकार में भी
जीत हार की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया,
उलझ जाता हूँ किसी जीवन नियम के तहत
एक नई ऊर्जा-संचार की तलाश में,
रह रहकर सामने उत्पन्न होता एक दृष्टि-भ्रम
पल-पल में बदलती मृग- तृष्णा
प्रतिपल प्रतिफल एक नई मरीचिका
सफल सकल सा सही आँकलन पर
संघर्ष का सही आधार लिए बिना
पंख लिये लेता हूं एक ऊंची उड़ान
सुनाई देती है यहाँ भी विराग अनुराग में भी
जीवन जीत या हार की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया,
सुनाई देती हैं जहां,
अरुण करुण रुदन में भी,
हास परिहास की बात,
समझ से परे है एक ऐसी दुनिया
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