ये समाज है साहब,
यहाँ इंसान से पहले
उसका घर देखा जाता है,
उसकी जेब देखी जाती है,
उसका मज़हब, उसकी जात,
उसका पहनावा देखा जाता है।
यहाँ किसी के टूटे हुए दिल से
किसी को कोई मतलब नहीं,
बस इतना कहा जाता है—
कि “लोग क्या कहेंगे?”
एक लड़का बेरोज़गार हो
तो उसकी मोहब्बत पर सवाल उठते हैं,
एक लड़की अपनी पसंद चुन ले
तो उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं।
जो चुप रहे, उसे कमज़ोर कहते हैं,
जो बोल दे, उसे बदतमीज़।
जो भीड़ के साथ चले, वो अच्छा,
और जो सच के साथ खड़ा हो—
वो समाज के लिए ख़राब।
अजीब है ना…
हम इंसानों की दुनिया में रहते हैं,
मगर इंसान को ही
इंसान की तरह जीने नहीं देते।
कभी किसी की मजबूरी समझ लेना,
कभी किसी के ख़ामोश चेहरे को पढ़ लेना—
क्योंकि हर मुस्कुराता हुआ चेहरा
ख़ुश हो, ये ज़रूरी तो नहीं।
समाज बदलने से पहले,
अगर हमारी नज़र बदल जाए—
तो शायद कई ज़िंदगियाँ
बिना टूटे ही बच जाएँ.....!
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