शोषण की चक्की चली,
पिसा आत्म विश्वास।
सत्ता के इस खेल से
मन है निपट उदास ।।
फूट डाल शासन करे
करे सदा षडयंत्र ।
जनता को निर्बल करे
यही मूल है मंत्र ।।
शेर मेमनों के लिए
गढ़ता रोज विधान ।
शासन तो बस रह गया
शोषण का सामान ।।
सतत बीतते ही गए
दिवस महीने साल ।
उनके घर भरते गए
लोग हुए कंगाल ।।
तन मन सब जर्जर हुए
लोग हुए बीमार ।
इधर कोढ़ में खाज है
मंहगाई की मार ।।
चमचे चांदी काटते
करते जय जयकार ।
दिन दिन खोते जा रहे
हम अपने अधिकार ।।
मुंह पर ताले लग गए
सत्ता का आतंक ।
अर्जुन वे राजा हुए
और हुए हम रंक।।
-अर्जुन प्रभात
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