आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्यूँ कुछ नहीं मैं कह पाती

                
                                                         
                            यौन उत्पीड़न पीड़ित
                                                                 
                            
हर स्त्री,युवती
चीख नहीं पाती
सांत्वना नही पाती
घुटती है मन ही मन
झेलती है पीड़ा पल पल
अकेले!
कौन शिकार नहीं
यहां इस जुर्म का
तुम??
तुम्हें कभी किसी ने छूने की कोशिश नहीं की
तिरक्षी नजरों से मुस्कुरा के नहीं देखा
शब्दों से
रक्तस्राव से भी भारी
प्रहार नहीं किया?
किसी से कह पाती हो तुम
पाती हूँ हर दफा खुद को एक किनारे
देखती हूँ खबरों में
जिस्मी शोषणों की कहानी
घिनौनेपन के पीछे जिम्मेदारी
खुद को ही मानती
हिस्सा होकर हिंसा का
क्यूँ नहीं मैं किसी से कुछ कह पाती?
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर