यौन उत्पीड़न पीड़ित
हर स्त्री,युवती
चीख नहीं पाती
सांत्वना नही पाती
घुटती है मन ही मन
झेलती है पीड़ा पल पल
अकेले!
कौन शिकार नहीं
यहां इस जुर्म का
तुम??
तुम्हें कभी किसी ने छूने की कोशिश नहीं की
तिरक्षी नजरों से मुस्कुरा के नहीं देखा
शब्दों से
रक्तस्राव से भी भारी
प्रहार नहीं किया?
किसी से कह पाती हो तुम
पाती हूँ हर दफा खुद को एक किनारे
देखती हूँ खबरों में
जिस्मी शोषणों की कहानी
घिनौनेपन के पीछे जिम्मेदारी
खुद को ही मानती
हिस्सा होकर हिंसा का
क्यूँ नहीं मैं किसी से कुछ कह पाती?
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