काट झोपड़ों की बिजली, जो अपना झाड़ फानूस सजाते हैं।
सुन नभ का गर्जन, औ' देख बिजली का नर्तन वे कांप जाते हैं।।
लहूलुहान घावों पर जो झूठे आंसू बहा लोगों को बहलाते हैं
दर्द वे क्या जाने मजलूमों का,जो फाड़ पतलूनों को फैशन बताते हैं।।
वक्त की मेहरबानी पर न हो ज्यादा घमंड, बिगड़ते वक्त के हत्थे चढ़ ,
अच्छे अच्छों की धमनियों के लहू भी ठंढे पड़ जाते हैं।।
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