भीड़ बहुत थी मगर तलाश थी
एक सच्चे हमदर्द की उन्हें
तजरबा कह रहा था जमाने का
हस्र होगा वही फिर एक बार
मालूम था नहीं आएगा कोई
कांधे पर उठाने आखरी रवानगी पर
उम्मीद थी शायद साथ चलेंगे सब
मगर जाते हुए देख भीड़ लौटने लगी
दर्द जाने से ज्यादा इस बात का था
कोई अपना ना मिला वक्त आखरी था जब
लहू के रंग एक जैसे थे सभी के
फर्क बस इतना कोई अपना ना मिला
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