मकर संक्रांति की पावन बेला आई
मंदिर में शंख नाद की गूँज लहराई
खुशी की लाली आसमान पर छाई
सूर्य के आँगन में बजने लगी शहनाई
दक्षिण से उत्तर की ओर
सूरज ने अपनी राह घुमा कर
शुभ घड़ी की शुरुआत कराई
मकर संक्रांति की पावन बेला आई
प्रकृति में बदलाव लाई
शीत ऋतु की मद्धम चाल कर के
दिन लम्बे और छोटी रातें लाई
गुनगुनी धूप मन को भाई
रंग बिरंगे फूलों से बगिया मुस्कुराई
किसानों के चेहरे पर खुशी छाई
अन्नपूर्णा स्वयं घर उनके आई
मकर संक्रांति की पावन बेला आई
सपनों के मांजे उंगलियों पर लपेटे
मन में उम्मीदों के परिंदे उड़ाती आई
विश्वास की डोर से बंधी हुई
उल्लास की पतंगे आसमान में लहराईं
गुड़ की मिठास तिल में समा कर
जीवन में ख़ुशियों की बहार लाई
मकर संक्रांति की पावन बेला आई
डा॰ अपर्णा प्रधान
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