जागती आँखें…
रात के दो बजे हैं,
सब सोए हैं,
चारों ओर अँधेरा है।
आसमान में एक भी तारा
नहीं टिमटिमा रहा है।
सन्नाटे को चीरती अचानक
गार्ड की सीटी की आवाज़,
बिल्लियों के लड़ने का शोर,
अधकच्ची नींद को उड़ा गया।
अब फिर सब शांत है,
हर ओर ख़ामोशी है,
सब सोए हैं अपनी नींद में।
बस जागी हैं तो
मेरी ये दो आँखें…
न जाने किसकी तलाश में,
न जाने किस इंतज़ार में।
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