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रूह का रिश्ता

                
                                                         
                            हँसने के लिए तो पूरी दुनिया है,
                                                                 
                            
पर रोने के लिए सिर्फ तुम हो।
मेरी हर एक रचना में तुम होते हो,
जब तुम सोते हो तो भी मुझमें जगते रहते हो।
कामयाबी का किस्सा तो हर कोई सुनता है,
पर दर्द में सिर्फ तुम्हारा हिस्सा है।
मैं हँस तो लूँगी कहीं भी,
पर रोने के लिए तू ही मेरा है।
तुम्हारे पास बेशक कई होंगे,
पर मेरे पास तेरे अलावा क्या है?
जिस्मानी इश्क़ नहीं है मेरा,
रूह पर तेरा कब्ज़ा है।
तेरी खामोशी से मैं तिल-तिल मरती हूँ,
लफ़्ज़ों से सँवरती हूँ।
तू जीने की वजह है,
मैं मरने से न डरती हूँ।
जीने की कल्पना तेरे बिना अकल्पनीय है,
तुम ही मेरे रूहानी इश्क़ और जीने की वजह हो, क्योंकि मैं तुममें ही शुरू होकर तुम पर ही ख़त्म हो जाती हूँ
जीने की कल्पना तेरे बिना अकल्पनीय है,
यह कैसा हमारा रिश्ता, जो इतना वंदनीय अनंतिम है।
तू दूर होकर भी धड़कता है सीने में मेरे,
तेरा मुझसे यह राब्ता, सचमुच अतुलनीय है।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

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