चोट खाकर भी मुस्कान लुटाती हूं,
आँसुओं को छुपाकर दुआएँ सजाती हूं।
मेरे सहने में ही मेरी पहचान है,
मैं माँ हूं — दर्द सहकर भी जग को जनम देती हूं।
-अनुराधा पवन प्रजापति
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X