घर लौट आने को जी चाहता है
बचपन दोहराने को जी चाहता है
परदेश से जा के गाँव में माँ को
फिर गले लगाने को जी चाहता है
वो साथी जो सारे छूट गए हमसे
उनको मनाने को जी चाहता है
इक राधा थी जिसका मैं कान्हा था
फिर बंसी बजाने को जी चाहता है
‘सुब्रत’ शहर अच्छा नहीं तौबा कर
ख़ुद को समझाने को जी चाहता है
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