हे आदि पुरुष हे आदि अनंत।।
हे संभू नाथ त्रिपुरारी।।
दर्शन चाहता हूं में आपके।।
बिनती है नाथ हमारी।।
में जन्मों जन्म से बुला रहा।।
नाथ कब मेरी टेर सुनोगे।।
मुझ अभागे दीन को प्रभु।।
कब आकर दर्शन देओगे।।
में दर दर भटक चुका अब तो।।
अब और ना मुझको भटकाओ तुम।।
मोरे नैना राह अब निहार रहे।।
अब आकर नैनो की प्यास बुझाओ तुम।।
तुम ही करता तुम ही धरता।।
तुम ही रुद्र रूप अवतारी हो।।
जो सबको बिन सोचे सब कुछ दे दे।।
हे नाथ तुम ऐसे भोला भंडारी हो।।
हे नाथ में भी अभागा दीन दुःखी।।
मैने तेरे द्वार पे अलख जगाई है।।
आकर के दुःख दर्द मेरे सब हर लीजे।।
मैने तुमसे करी ये दुहाई है ।। (
-अंशुल शाक्य
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