निराशा हताश कर देती है
तोड़कर रख देती है
कल्पनाओं का समन्वय
झकझोर देती है
मस्तिष्क और शरीर को
टूट जाते हैं सपने
छूट जाते हैं कुछ अपने
जब छा जाती है घोर निराशा
तब उत्पन्न होता है.... भय....।
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