तुम कम बोलते हो, तो क्या हुआ,
हर बात को लफ़्ज़ों में कहना ज़रूरी तो नहीं।
कुछ एहसास ख़ामोशी में भी पलते हैं,
हर रिश्ते को आवाज़ देना ज़रूरी तो नहीं।
तुम्हें दुनिया शायद शांत समझे,
मगर मैंने तुम्हारी ख़ामोशी में बहुत कुछ सुना है।
जहाँ लोग भीड़ में ख़ुद को तलाशते हैं,
वहाँ तुमने अकेले रहकर ख़ुद को चुना है।
तुम कहते हो, लोग आएँगे, लोग जाएँगे,
सच है, हर कोई हमेशा साथ कहाँ रहता है।
मगर कभी-कभी कोई ऐसा भी मिल जाता है,
जो जाने के बाद भी दिल के पास रहता है।
तो ख़ुद को बदलने की कोशिश मत करना,
तुम्हारी यही ख़ामोशी तुम्हारी पहचान है।
बस इतना याद रखना,
हर किसी को तुम्हारी बात समझ आए, ये ज़रूरी नहीं है 'अभ्र',
पर किसी एक का तुम्हें बिना कहे समझ जाना ही काफ़ी है।
~ अभ्र
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