भीतर का कृष्ण जगा दो
केवल वो माखनचोर नहीं, वो रणभूमि का नायक था l
रणनीति विचारों का माहिर, हर विपदा हरण सुखदायक था।l
विपदा की छाती पर चढ़कर जो, हरदम मुस्कुराता था ।
अधर्मी चाहे हो लाख बली , वो काल बन मंडराता था ।।
इरादों का गांडीव उठा लो अब , ओर बंद विश्राम करो ।
लहू रगों में गर्म रहे , जब तक ना लक्ष्य निज नाम करो।।
कायर रोते हैं किस्मत पर, तुम सिंह की तरह हुंकार भरो ।
भीतर के सोए कृष्ण को जगा दो, और रण का शंखनाद करो ।।
तन की शक्ति , मन की भक्ति से, हर चक्रव्यूह को तोड़ दो ।
कोई बाधा बन रास्ता रोकें, तो तूफानों का रूख मोड़़ दो।।
ना झुकना है, ना रुकना है, अंगारों पर भी चलना है ।
अन्याय का काल बन , मेघ बन गरजना है ।।
सुदर्शन चक्र सा तेज जगाओ, गर्म लहू के सीने में ।
जब तक लक्ष्य ना हासिल हो, तब तक आग लगी रहे जीने में।।
मेहनत की भट्टी में तपकर, तुम सफलता का आगाज करो ।
उठो देश के वीर युवाओं, फिर धरती पर कृष्ण सा राज करो ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X