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माँ की गृहस्थी

                
                                                         
                            माँ सम्पूर्ण गृहस्थी का सार होती है |
                                                                 
                            
अपने बच्चो का सम्पूर्ण संसार होती है।
लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते है।
फिर वो अपनी अपनी माँ को भुलाते है।
गृहस्थी को दो भागो मे बटवाते है।
फिर बच्चे अपनी माँ को वृद्धा आश्रम तक
पहुंचाते है।
न जाने किस जनम की जन्म की दुश्मनी उनसे निभाते है|
माँ की सम्पूर्ण गृहस्थी उजड़ जाती है।
माँ की सारी अभिलाषाएँ चूर-चूर हो जाती है !
फिर वो इस संसार को बिसराती है |
फिर वो इस जीव जगत को त्याग कर एकांतवास मे जाती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

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